हम कंप्टीशन के उस दौर में अपनी शुरुआत कर रहे हैं, जब आंख बंद कर फेंका गया पत्थर भी किसी ना किसी छोटे-बड़े कंटेंट प्लेटफॉर्म पर ही जाकर गिरेगा। लेकिन फ़िर भी हम कॉन्फिडेंट हैं। कुछ वैसे ही जैसे 3-इडियट्स देख हर इंजीनियरिंग स्टूडेंट अपने आपको ‘रैंचो’ समझने लगा था। यहां तक कि हर बैच का चतुर भी। हम नहीं जानते कि देर से शुरू की गई इस ‘रेस’ में हम कहां ठहरेंगे! लेकिन जो बात तय है, वो ये कि इस सफ़र में हम सक्सेस नहीं एक्सीलेंस के पीछे भागेंगे। क्या पता कामयाबी झक माकर पीछे आ ही जाए!

‘लालटेन’ क्यों?

जब रौशनी के मौजूदा और प्राथमिक विकल्प जवाब दे जाएं तो लालटेन जैसी वैकल्पिक व्यवस्थाएं मोर्चा संभालती हैं। यही हमारा विज़न है। जर्नलिज़्म के लिए स्थापित ढांचा अपना काम करे ना करे, हम अपनी जिम्मेदारी ज़रूर निभाएंगे। हमारी लौ भले ही छोटी हो, लेकिन अपने हिस्से का उजाला फैलाने से हम पीछे नहीं हटेंगे।

हम क्या देंगे?

हमारी सबसे बड़ी फ़िक्र इस लालटेन के ‘तेल’ यानी रेवेन्यू मॉडल को लेकर है! इस तरह के प्लेटफॉर्म्स के लिए मौज़ूद तमाम मॉडल्स में से गूगल-एडसेंस हमारे लिए सबसे ज्यादा माकूल है। क्योंकि यही एक ज़रिया है, जिससे हम कुछ देर बाद सही लेकिन बिना दवाब के बिल्कुल वैसा काम कर पाएंगे जैसा हम चाहते हैं। इसके लिए हमें इस प्लेटफॉर्म को कंटेंट की ऐसी ‘थाली’ बनाना होगा, जिसमें हर किस्म के रीडर/व्यूअर को कुछ ना कुछ नया और बेहतर ज़रूर मिले, फिर चाहे वो किसी भी कैटेगरी का क्यों ना हो।

लेकिन हम फ़िर दोहरा दें, आप से भी और खुद से भी ‘हमारी ज़िद और आख़िरी लक्ष्य पत्रकारिता करना ही है। वो किसी ने कहा है ना कि- हम उड़ेंगे, उड़ ना पाए तो दौड़ेंगे, दौड़े भी नहीं तो चलेंगे और चल भी ना सके तो रेंगेंगे।’ लेकिन जर्नलिज़्म जरूर करेंगे।