देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मानव-वन्यजीव संघर्ष गहराता जा रहा है। गुलदार और हाथियों के बाद अब भालुओं की बढ़ती सक्रियता और आबादी वाले क्षेत्रों में उनकी घुसपैठ ने ग्रामीणों के साथ वन विभाग की नींद उड़ा दी है। सर्दियों में गुफाओं में शीतनिद्रा (Hibernation) के लिए जाने वाले भालू अब गांवों के पास न सिर्फ इंसानों पर हमले कर रहे हैं, बल्कि घरों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस साल सितंबर तक भालुओं के हमलों में 4 लोगों की मौत और 45 लोगों के घायल होने के बाद, अब भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) भालुओं के बदलते व्यवहार और रिहाइशी इलाकों में आने के कारणों का पता लगाने के लिए 60 लाख रुपये की लागत से वैज्ञानिक अध्ययन शुरू करने जा रहा है उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष पहले ही गंभीर समस्या बना हुआ है। गुलदार, बाघ और हाथियों के हमलों के बीच अब भालुओं की बढ़ती सक्रियता ने पहाड़ों में नई चुनौती खड़ी कर दी है।
इस वर्ष जनवरी से 30 सितंबर तक भालुओं के हमलों में चार लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 45 लोग घायल हुए हैं। यह आंकड़ा बताता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में भालुओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है। चमोली और उत्तरकाशी जिलों के विभिन्न इलाकों में भालुओं द्वारा घरों को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी सामने आई हैं। जंगलों से सटे गांवों में रहने वाले लोगों के लिए खेतों में काम करना, मवेशियों को चराना और रोजमर्रा के दूसरे काम करना जोखिम भरा होता जा रहा है। ऐसे में केवल हमलों के बाद कार्रवाई करने के बजाय उनके व्यवहार और आबादी की ओर बढ़ने के कारणों को समझना जरूरी हो गया है।
- रेडियो कॉलर से होगी चौबीस घंटे निगरानी: अध्ययन के दौरान कुछ भालुओं पर रेडियो कॉलर लगाए जाएंगे। इस तकनीक के जरिए वन्यजीव विशेषज्ञ उनकी लोकेशन और आवाजाही को ट्रैक कर सकेंगे। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि भालू किन जंगलों और क्षेत्रों में अधिक सक्रिय हैं तथा किस परिस्थिति में आबादी वाले इलाकों का रुख कर रहे हैं। अध्ययन में उनके विचरण क्षेत्र और व्यवहार में आ रहे बदलावों का आकलन किया जाएगा। साथ ही यह समझने का प्रयास होगा कि प्राकृतिक आवास, भोजन की उपलब्धता और मानवीय गतिविधियों का उनकी आवाजाही पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
- अध्ययन के आधार पर बनेगी संघर्ष रोकने की रणनीति: अपर प्रमुख मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव डॉ. विवेक पांडेय के अनुसार, भारतीय वन्यजीव संस्थान भालुओं के व्यवहार में बदलाव के कारणों का वैज्ञानिक विश्लेषण करेगा। संस्थान मानव-भालू संघर्ष को कम करने के लिए आवश्यक उपाय भी सुझाएगा। अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर वन विभाग भविष्य की रणनीति तैयार करेगा। डब्ल्यूआईआई जल्द ही इस परियोजना पर काम शुरू करेगा। इससे उम्मीद है कि भालुओं की बढ़ती सक्रियता के पीछे के कारण स्पष्ट होंगे और पहाड़ों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए अधिक प्रभावी कदम उठाए जा सकेंगे।


