रामनगर। जंगली बाघों को बचाने की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक पिंजरे स्वयं बाघों के लिए खतरा बन सकते हैं। पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश श्रीवास्तव ने चेतावनी दी है कि यदि पिंजरे की डिज़ाइन बाघ के स्वाभाविक व्यवहार को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई, तो बचाव अभियान ही बाघ को स्थायी रूप से घायल कर सकता है और उसे जंगल लौटने लायक नहीं छोड़ता।
श्रीवास्तव कहते हैं, “जंगल से अचानक पकड़ा गया बाघ कैद से निकलने के लिए अपनी जान तक दांव पर लगा देता है। वह सलाखों, दरवाजों और छोटे-से अंतराल को बाहर निकलने का रास्ता समझता है। चौड़ी दूरी वाली सलाखों वाले पिंजरे में बाघ अपना मुंह घुसा सकता है। जोर लगाने पर उसके कैनाइन (शिकारी) दांत टूट जाते हैं। दांत टूटने के बाद वह बाघ जंगल में वापस छोड़ने लायक नहीं बचता और पूरा बचाव अभियान विफल हो जाता है।”
वे बताते हैं कि पारंपरिक लोहे के पिंजरे मुख्य रूप से मानव सुरक्षा को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं, न कि बाघ की सुरक्षा को। जंगली बाघ और चिड़ियाघर के मानव-आदी (मानव अभ्यस्त) बाघ के व्यवहार में बड़ा अंतर होता है, इसलिए दोनों के लिए एक जैसी प्रक्रिया अपनाना गलत है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने परिवहन पिंजरे के डिज़ाइन और आयामों के स्पष्ट दिशानिर्देश दिए हैं, लेकिन उनका व्यापक क्रियान्वयन अभी बाकी है।
श्रीवास्तव का कहना है कि चिड़ियाघरों और बचाव केंद्रों में इस्तेमाल होने वाली चेन-लिंक फेंसिंग भी चिंता का विषय है। यदि बाघ उसमें पंजा या दांत घुसा पाता है, तो डिज़ाइन पर पुनर्विचार जरूरी है। उन्होंने सभी बाघ अभयारण्यों, चिड़ियाघरों और बचाव केंद्रों में पुराने पिंजरों व बाड़ों का राष्ट्रीय स्तर पर तकनीकी ऑडिट कराने और असुरक्षित संरचनाओं को चरणबद्ध तरीके से एनटीसीए दिशानिर्देशों पर आधारित नए पिंजरों से बदलने की मांग की है।
उन्होंने जोर दिया कि बचाव और पुनर्वास की असली सफलता बाघ के अपने घर (प्राकृतिक आवास) लौट जाने में है, न कि उपेक्षा के कारण उसे जीवन भर कैद में रखने में।


